मनमोहन सरकार का कारनामा । भारत चीन के भारी विरोध के बाबजुद परमाणु के अपनी शर्तौ पर एनएसजी गुप मे शामिल हो गया , भारत की कुटनीति जीत पर चीन अब अपने फायदे की बात करने लगा है जिससे भारत मे बनने बाले परमाणु बिजलीधरो मे अपना माल बेच सके . व्यावसाहिक कोण से भारत मे निवेश भारी मात्रा मे होना है क्यो कि २०२० भारत अपनी पुरी ताकत से ५०,००० मे. बिजली बनायेगा
कुछ देशों की आपत्तियों के बीच इस मंज़ूरी के लिए अमरीका और भारत को अपने कुछ मित्र देशों के साथ मिलकर ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी और तब जाकर तीसरे दिन की बैठक में यह फ़ैसला लिया गया. इस मंज़ूरी के साथ ही भारत के साथ परमाणु सौदों पर 34 साल से लगा प्रतिबंध ख़त्म हो गया है. हालांकि अभी मंज़ूरी के विवरण नहीं मिले हैं. इस समझौते को लागू करने के लिए अब इसे अमरीकी संसद के सामने मंज़ूरी के लिए रखा जाएगा. स्वागत भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस मंज़ूरी का स्वागत करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के क्षेत्र में भारत के दूसरे देशों के साथ सहयोग का एक नया अध्याय शुरु होगा. प्रणव मुखर्जी ने कहा, "हमें प्रसन्नता है कि आख़िर हमने वो वादा निभाने में सफल रहे जो हमने संसद में और भारत की जनता के सामने किया था." भारत में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुख्यपार्टी कांग्रेस के नेताओं ने इसे भारत की एक बड़ी जीत बताया है. जबकि भारतीय जनता पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने कहा है कि वे जानना चाहते हैं कि यह मंज़री किन शर्तों पर मिली है. भारत के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों में से एक के संथानम ने कहा है कि यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है और इससे भारत के लिए परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कई दरवाज़े खुल जाएँगे. उनका कहना है कि इससे भारत और अमरीका को फ़ायदा ही फ़ायदा दिखता है और उनकी नज़र में दोनों देशों को इसे हासिल करने के लिए कुछ खोना नहीं पड़ा है. अड़चनें इस समझौते को एनएसजी की मंज़ूरी का रास्ता आसान नहीं था क्योंकि न तो भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और न वह भविष्य परमाणु परीक्षण करने के अपने अधिकार को खोना चाहता है. 21 और 22 अगस्त को पहले दौर की बैठक में इस समझौते को मंज़ूरी देने के मामले में सहमति नहीं बन सकी थी और दूसरे दौर की बैठक बुलानी पड़ी.  | | | एनएसजी की मंज़ूरी के लिए सदस्य देशों में सर्वसम्मति होना ज़रुरी था |
गुरुवार और शुक्रवार को दूसरे दौर की बैठक के बाद भी यह असमंजस बना हुआ था कि इस समझौते को मंज़ूरी मिलेगी या नहीं. दरअसल ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, न्यूज़ीलैंड और आयरलैंड इस बात पर अड़े हुए थे कि परमाणु ईंधन, उपकरणों और परमाणु तकनीक के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत को बिना शर्त प्रवेश देना ठीक नहीं होगा. इनका कहना था कि परमाणु अप्रसार संधि और व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर दस्तख़त किए बगैर भारत को इस तरह की छूट नहीं दी जा सकती. इसके अलावा भारत के पड़ोसी देश चीन को इस बात पर आपत्ति थी कि आख़िर भारत और अमरीका को इतनी जल्दी किस बात की है. जहाँ तक परमाणु अप्रसार की बात है तो भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने ये दोहरा कर एनएसजी के देशों को भरोसे में लेने की कोशिश की थी कि भारत ने स्वेच्छा से परमाणु परीक्षणों पर रोक लगा रखी है. लेकिन भारत इस रुख़ पर कायम रहा कि भविष्य में परमाणु परीक्षण करने पर परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोक देने के प्रस्ताव को वह समझौते में शामिल नहीं करेगा. विएना में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के बयान ने एनएसजी के कई देशों को मनाने में सकारात्मक भूमिका निभाई. New and Pic form BBC - hindi |