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न्यायपालिका भी भ्रष्ट है-मनमोहन |
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प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने स्वीकार किया कि सरकार के साथ-साथ न्यापालिका में भी भ्रष्टाचार है, जिससे निपटने के लिए विशेष अदालतें गठित की जानी चाहिए।
प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों के सम्मेलन में बेलागी के साथ कहा कि लंबित मामलों और न्याय मिलने में देरी के अलावा भ्रष्टाचार एक और चुनौती है, जिसका हम सरकार और न्यायपालिका दोनों में सामना कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत के प्रधान न्यायधीश ने मुझे लिखा है कि भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए हम विशेष अदालतें गठित करें। मैं फौरन ऐसी कोई व्यवस्था किए जाने से सहमत हूँ। ऐसा करने से हम अपनी न्यायपालिका के प्रति देश और देश के बाहर और अधिक विश्वास अर्जित कर सकेंगे।
सिंह ने न्यायपालिका और विधायिका द्वारा एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में कथित हस्तक्षेप की शिकायतों के बीच कहा कि शासन की प्रक्रिया में हमारी भूमिकाएँ हमारे शानदार संविधान ने परिभाषित कर रखी हैं, लेकिन हम इसे व्यवहार में कैसे उतारते हैं यह हमारे खुद के आचरण और देश में विद्यमान सामाजिक एवं राजनीतिक वातावरण से काफी हद तक प्रभावित होता है।
उन्होंने कहा कि हमारे लिए यह जरूरी है कि हम एस-दूसरे से समय-समय पर बात करते रहें जिससे कि यह सुनिश्चित हो सके कि हम वाकई संविधान द्वारा रेखांकित की गई अपनी अपनी भूमिका निभा रहे हैं और साथ ही अपनी जनता की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा रहे हैं।
लंबित मामलों में कमी लाने के इरादे से पारिवारिक अदालतों के गठन में कई राज्य सरकारों द्वारा उत्साह नहीं दिखाए जाने पर प्रधानमंत्री ने निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पारिवारिक अदालत अधिनियम 1984 के तहत दस लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहरों में पारिवारिक अदालत का गठन किया जाना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा बहुत सारी राज्य सरकारें अपने इस कानूनी कर्तव्य को पूरा करने में अभी तक असफल रही हैं। परिणामस्वरूप याचिकाकर्ताओं को जिनमें से अधिकतर सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हैं, अपनी शिकायतों के निराकरण के लिए लंबा सफर तय करके अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे में यह जरूरी है कि देश के सभी 465 जिलों में कम से कम एक पारिवारिक अदालत हर हाल में गठित की जाए। मैं राज्य सरकारों से आग्रह करता हूँ कि वे इस संदर्भ में शीघ्र कार्रवाई करें।
उन्होंने कहा उन्हें बताया गया है कि मामलों को जल्दी निपटाने के प्रयासों के बावजूद आने वाले नए मामलों की संख्या निपटाए जाने वाले मामलों से कहीं अधिक है। इसके चलते जब तक विशेष उपाय नहीं किए जाएँगे तब तक लंबित मामलों की संख्या बढ़ती ही जाएगी। |