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मै बन गया थानेदार अब डर काहे का E-mail
advaniसांसदजी,लोकसभा की दो सीटों तक सिमट चुकी भाजपा को सत्ता में लाने का करिश्मा दिखा चुके भाजपा के 'कृष्ण' लालजी को पार्टी ने अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर न सिर्फ अटलबिहारी वाजपेयी की विरासत सौंपी बल्कि उनसे अपनी अपेक्षाएँ भी बढ़ा लीं।

आ� नवंबर 1929 को गुलाम लेकिन अविभाजित भारत के कराची में पैदा हुए लालकृष्ण आडवाणी का मूल नाम लालकिशन चंद्र आडवाणी है लेकिन पार्टी में उनके समकालीन प्यार से उन्हें 'लालजी' बुलाते हैं।

कराची के सेंट पैट्रिक्स में शुरुआती शिक्षा के बाद बंबई विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल करने वाले आडवाणी ने हालाँकि कभी वकालत नहीं किया लेकिन हमेशा राष्ट्रवाद के पैरोकार बने रहे। उच्चतम न्यायालय में वे एक बार वकील के तौर पर उतरे। वह साल 1974 का था जब वे पार्टी की ओर से राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई सलाह पर काले लिबास में देश की शीर्ष अदालत में दलील देने पहुँचे।

कभी फिल्मों की समीक्षा लिखने वाले भाजपा के इस शीर्ष पुरुष फिल्मों के साथ साथ पुस्तकें पढ़ने और उनका संग्रह करने का शौक है। उन्हें अपने पुस्तकों के संकलन पर फख्र भी है।

गाँधी ने जिस साल अंग्रेजों भारत छोड़ों का नारा दिया उसी साल आडवाणी 1942 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य बने। तब उन्हें कराची में संघ की शाखा के सचिव का दायित्व सौंपा गया था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 1951 में स्थापित जनसंघ के जमाने से राजनीति में सक्रिय आडवाणी 1986 में भाजपा अध्यक्ष बने और उसके बाद राम रसायन और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रतापसिंह के 'मंडल' विष की काट के तौर पर 'रथयात्रा' पर सवार होकर मजबूती से स्थापित हुए।

पहली बार 1989 में लोकसभा में दाखिल होने वाले आडवाणी 1977 की जनता सरकार के समय देश के सूचना प्रसारण मंत्री थे। उस समय वह राज्यसभा के सदस्य थे जो सिलसिला 1970 से चल रहा था। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर आपातकाल के दौरान लगी बंदिशों की कड़ियाँ तोड़ीं। आपातकाल के दौरान वे बेंगलुरू जेल में मीसा के तहत कैद रहे।

राजस्थान में संघ का कामकाज देखने के बाद 1957 में दिल्ली आए इस नेता ने 1973 से 1977 तक जनसंघ के अध्यक्ष का कामकाज संभाला। 1980 में भारतीय जनता पार्टी का जन्म होने पर वे पार्टी के महासचिव बनाए गए और 1986 में इसी पार्टी के अध्यक्ष बने। इससे पहले 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में पार्टी दो सीटों तक सिमट गई थी और दिग्गज अटलबिहारी वाजपेयी भी चुनाव में पराजित हो चुके थे।

भाजपा अध्यक्ष के रूप में आडवाणी का अंतिम कार्यकाल काफी उ� ा-पटक वाला रहा जिस दौरान उन्होंने पाकिस्तान यात्रा पर जाकर मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में जो बयान दिया, उसे लेकर हिन्दुवादी संग� नों में तूफान उ� ा। 18 सितंबर 2005 को भाजपा अध्यक्ष पद से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और उसके बाद राजनाथसिंह ने पार्टी की बागडोर संभाली थी। लेकिन इससे पहले संन्यासिन नेता उमा भारती ने उनकी कार्यशैली पर तोहमत लगाई और मदनलाल खुराना ने भी बगावत की।

आडवाणी ने दिसंबर 2006 में देश का प्रधानमंत्री बनने की अपनी ख्वाहिश बयाँ की जिसके बाद से पहले से ही दूसरी पंक्ति के नेताओं में छिड़ी कुर्सी की जंग में शीर्ष नेतृत्व की लड़ाई शुरू हो गई जिसमें मुरली मनोहर जोशी जैसे बड़े नेता शामिल हो गए।

इस रथयात्री ने एक टेलीविजन चैनल को दिये साक्षात्कार में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली का हवाला देते हुए कहा था कि विपक्ष का नेता प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार होता है। इसके बाद से भाजपा में इस बात पर लगातार मंथन चल रहा था जिसका पटाक्षेप आज पार्टी के संकल्प के साथ हो गया। इसके साथ ही आडवाणी से पार्टी कार्यकर्ताओं की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं।

 

news- webdunia

 
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