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लालू व्यस्त, अफसर मस्त, रेल यात्री पस्त E-mail
laloo yadav सांसदजी की रेल पटरी स उतर रही है , आज कल लालु जी कही ओर समय दे रहे है , रेलमंत्रालय भगवान भरोसे चल रहा जिसके चलते आम यात्री की कोई फिक्र किसी को नही । जागरन का विशलेण । [संजय सिंह]। रेलमंत्री लालू प्रसाद जरा बिहार में क्या व्यस्त हुए कि उनकी रेल एकदम लड़खड़ाने लगी है। रेलमंत्री की ढील का फायदा उ ाते हुए रेल अधिकारी आराम फरमाने लगे हैं और उन्होंने रेल संचालन को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। तभी तो पिछले कुछ समय से न केवल ज्यादातर ट्रेनें लेट चल रही हैं बल्कि उनका रखरखाव भी गड़बड़ा गया है। छोटी-मोटी दुर्घटनाओं का ग्राफ भी अचानक बढ़ गया है। इसके बावजूद रेल मंत्रालय की तरफ से कोई कारगर कार्रवाई होती नहीं दिखती।

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली से लखनऊ और हावड़ा रूट पर चलने वाली ज्यादातर ट्रेनें चार से छह घंटे की देरी से चल रही हैं। शुक्रवार को सात बजे पहुंचने वाली लखनऊ मेल सुबह साढ़े दस बजे लखनऊ पहुंची। इसी तरह दिल्ली से कानपुर के बीच चलने वाली श्रमशक्ति एक्सप्रेस को छह घंटे ज्यादा लगे। यह ट्रेन पिछले कई दिनों से लगातार विलंब का शिकार हो रही है। ये तो कुछ उदाहरण हैं। हावड़ा रूट पर चलने वाली ज्यादातर ट्रेनों का कमोबेश यही हाल है। फिर चाहे बात वैशाली एक्सप्रेस की हो या गोरखधाम अथवा बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस की। ज्यादातर ट्रेनें देर से ही गंतव्य पर पहुंच रही हैं। इससे इन ट्रेनों से यात्रा करने वाले यात्रियों और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अफसोसनाक यह है किउनकी शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं है।

इतना ही नहीं, ट्रेनों और स्टेशनों के रखरखाव की स्थिति भी अत्यंत दयनीय हो गई है। गुरुवार को कानपुर से दिल्ली पहुंची श्रमशक्ति एक्सप्रेस के पार्सल वैन का लाक फंस गया जिससे लोगों को अपना सामान हासिल करने में नाकों चने चबाने पड़े। ट्रेन संचालन के मोर्चे पर चल रही हद दर्जे की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों गाजियाबाद में एक ट्रेन बिना ड्राइवर के लगभग दस किलोमीटर तक उलटी दिशा में चलती रही। वह तो गनीमत थी कि उस रूट पर कोई ट्रेन नहीं आई और दुर्घटना नहीं हुई। मगर ऐसा नहीं है कि दूसरी जगहों पर दुर्घटनाएं न हो रही हों। शनिवार को सहरसा में पैसेंजर ट्रेन का खड़ी हुई पैसेंजर ट्रेन से टकराना कार्मिक लापरवाही का नायाब नमूना है।

यात्री ट्रेनों के रखरखाव का आलम यह है कि शताब्दी जैसी वीआईपी ट्रेनें भी भारी कुव्यवस्था का शिकार हो रही हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली-अमृतसर और दिल्ली-कालका शताब्दी ट्रेनों के टायलेट्स की दुर्दशा को लेकर यात्रियों को अक्सर शिकायत करते सुना जा सकता है। टीटी अब भी यात्रियों के साथ बदसलूकी कर रहे हैं। पिछले दिनों एक टीटी ने दिल्ली के एक पत्रकार के असली टिकट को नकली बताकर उससे छह सौ का जुर्माना वसूल लिया। दुर्घटनाओं के बावजूद नई दिल्ली स्टेशन पर भीड़ प्रबंधन में कोई सुधार अब भी दिखाई नहीं देता। यहां तक कि प्लेटफार्म नंबर-1 तथा 12 नंबर जैसे वीआईपी प्लेटफार्र्मो तक पर बिना चोट खाए चलना मुश्किल है। ट्रेनों की लेटलतीफी को लेकर तो अधिकारियों के पास सर्दियों के मौसम और कोहरे का बहाना है। परंतु भीड़ प्रबंधन व ट्रेनों के रखरखाव के सवाल का उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं है। रेलमंत्री लालू प्रसाद को जल्द ही कुछ करना होगा।

 
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