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सांसदजी मिलिंद देवड़ा के साथ बी.बी सी से 'एक मुलाक़ात' E-mail
mikild arora सांसदजी मिलिंद देवड़ा के साथ बी.बी सी से 'एक मुलाक़ात' युवा सांसदजी मिलिंद देवड़ा जो देखने में ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ बहुत अच्छे वक्ता भी हैं. मिलिंद से मेरी मुलाक़ात उनकी किशोरावस्था के दिनों में ही हो चुकी है. वो देश की सबसे धनी और समृद्ध लोगों के लोकसभा क्षेत्र दक्षिणी मुंबई से चुने गए हैं. BBC-hindi

 

देश के सबसे युवा सांसद होने पर आपको कैसा लगता है. क्या कभी सोचा था कि राजनीति में आएंगे या कुछ और करने निकले थे और सांसद बन गए?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि राजनीति में आउंगा. मेरी पढ़ाई पहले भारत में हुई और बाद में मैं बोस्टन पढ़ने गया. मैंने एक साल शिकागो में नौकरी भी की. भारत आया यहाँ भी कुछ निज़ी कंपनियों में काम किया. मैं देश के लिए कुछ करना चाहता था. मैंन सोचा था कि जब भी भारत लौटूंगा तो किसी न किसी तरह से देश की सेवा करूंगा. देश लौटने के बाद मैंने ‘स्पर्श’ नाम की एक संस्था बनाई और आज हम स्पर्श के माध्यम से मुंबई के 100 स्कूलों में मुफ़्त कंप्यूटर शिक्षा दे रहे हैं.

इस तरह से काम करते-करते मुझे पता चला कि स्थानीय स्तर पर कितनी समस्याएँ हैं. अभी आपने कहा कि दक्षिणी मुंबई में देश के सबसे अमीर लोग रहते हैं. लेकिन दक्षिणी मुंबई में शहरी ग़रीब लोगों की आबादी भी बहुत है. समस्याओं को देखकर लगा कि मुझे अपने काम को स्पर्श संस्था से आगे बढ़ाना चाहिए. इस तरह मेरी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी. मेरी पार्टी की अध्यक्षा ने मुझे 2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी से टिकट दिया और मैं दक्षिणी मुंबई से चुनाव में उतरा. मेरे घर से भी कभी दबाव नहीं था कि मैं राजनीति में जाऊं. मेरी मां का तो कहना था कि मैं राजनीति में न जाऊं. उनका कहना था कि राजनीति में जाकर निज़ी जीवन ख़राब हो जाएगा. कुछ हद तक उनका कहना सही भी है.

उन्होंने आपके पिता जी के अनुभवों से सीखा होगा. जिस तरह से उनका स्वभाव है उसे देखकर तो मुझे लगता है कि वो बहुत अच्छे पिता होंगे.

हाँ, वो बहुत अच्छे पिता हैं. बचपन से हम जब भी खाने पर बै ते थे तो कभी भी राजनीति की बातें नहीं करते थे. वो स्कूल, पढ़ाई और घर के व्यापार के बारे में बात करते थे. मेरे घर में राजनीति की बातें कम ही होती थीं. मेरे पिता राजनीति में आने से पहले एक व्यापारी थे और उसी तरह उन्होंने हमें भी बड़ा किया. मेरा बड़ा भाई राजनीति में नहीं है वो एक संगीतकार है. पिता जी उनको भी प्रोत्साहित करते हैं. लेकिन वो हमेशा कहते थे कि मिलिंद तुम कभी देश के लिए भी कुछ करना. तभी से मैं कुछ करना चाहता था. इसलिए मैं राजनीति में आया.

 मैं देश के लिए कुछ करना चाहता था. मैंन सोचा था कि जब भी भारत लौटूंगा तो किसी न किसी तरह से देश की सेवा करूंगा. देश लौटने के बाद मैंने ‘स्पर्श’ नाम की एक संस्था बनाई और आज हम स्पर्श के माध्यम से मुंबई के 100 स्कूलों में मुफ़्त कंप्यूटर शिक्षा दे रहे हैं.

 

जब आपकी उम्र के लड़के-लड़कियां पार्टी करते हैं, डांस करते हैं, मरीन ड्राइव पर घूमते हैं. उस समय आपको रैली निकालनी पड़ी. ये सबकुछ कैसा लगता था. ऐसा तो नहीं लगता था कि यार कहां फंस गए?

कभी-कभी लगता है कि कहां आ गया हूँ. मेरे दोस्त मुझे फ़िल्म के लिए कहते हैं लेकिन मेरा अगले दिन कुछ दूसरा कार्यक्रम होता है. व्यस्तता बहुत होती है. मुझे क्षेत्र में जाना होता है. लेकिन जो ज़िम्मेदारी मैंने ली है उसके लिए मुझे काफ़ी त्याग की ज़रूरत है और मैं करता हूँ. सांसद बनने के बाद पिछले तीन सालों में मुझे लोगों को जानने-समझने, विदेश-यात्रा करने और दूसरी चीज़ो को पास से देखने का जो मौका मिला उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ.

बलिदान और त्याग की बात तो ीक है लेकिन कुछ फ़ायदा भी तो मिलता होगा. कुछ मज़ा और रोमांच भी तो आता होगा.

नहीं रोमांच जैसी कोई बात नहीं है. आज विदेश में भारत की छवि बहुत सकारात्मक है. जब कभी भारत के युवा सांसद प्रतिनिधि के रूप में विदेश भेजा जाता है तब बहुत अच्छा अनुभव होता है. मैंने ये देखा कि अगर आप कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं तो सभी अधिकारी और हर राजनीतिक दल के सांसद आपकी मदद करते हैं. मुझे लगता है कि सबसे अधिक प्रोत्साहन की बात तब होती है जब हम आम आदमी की मदद कर पाते हैं. मुझे एक बार एक टैक्सी ड्राइवर मिला और कहा कि हमारी संस्था स्पर्श की वजह से उसकी बच्ची कंप्यूटर और अंग्रेज़ी सीख रही है.

मैं मुबंई में रहा हूँ. मैं देखा है कि स्पर्श ने बहुत काम किया हुआ है. लेकिन जिसे हल्का रोमांच कहते हैं सांसद बनने पर वो भी महसूस होता होगा.

पिता जी को बचपन से राजनीति में देखा है. वो कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता, सांसद और महापौर रहे हैं. इसलिए शक्ति की वजह से जो आदर मिलता है उसे लेकर किसी तरह का रोमांच मेरे अंदर नहीं है. मेरा मानना है इस तरह की ताकत हमेशा नहीं रहती है. ये बदलती रहती है. मैं राजनीति में इस तरह का आदर हासिल करने नहीं आया. अगर कोई ऐसी अपेक्षाएं रखेगा तो अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएगा.

आप जो कह रहे हैं वो बहुत ज्ञान की बात है. लेकिन अगर ईमानदारी से इसका पालन किया जा सके तो बहुत सी समस्याएं दूर की जा सकती हैं. आप अपनी पसंद का एक गाना बताएं.

मैं सच बताऊं तो मुझे आज के इंडीपॉप टाइप के गाने पसंद नहीं हैं. मुझे पुरानी फ़िल्मों के गाने बहुत अच्छे लगते हैं. एक फ़िल्म है ‘दो आँखें बारह हाथ’. उसका एक गाना है ए मालिक तेरे बंदे हम...

बचपन में किस चीज़ में सबसे अधिक रुचि किसमें होती थी.

बचपन में हमें गिटार सीखने भेजा जाता था. उस समय हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था. लेकिन जब मैं अमरीका गया तो गिटार बजाने लगा. आज तो मुझे गिटार बजाने का उतना समय नहीं मिलता. लेकिन संगीत में मेरी बहुत रुचि है. बहुत सुखद अनुभूति होती है संगीत सुनकर. बचपन से मैं जब कभी तनाव में होता था तो संगीत सुनता था और मुझे बहुत अच्छा लगता था.

बचपन में राजनीति को करियर के विकल्प के रूप में देखते थे.

अमरीका में प्रबंधन की पढ़ाई करते समय मैंने राजनीतिशास्त्र की कुछ कक्षाएं पढ़ी थीं. वैसे राजनीति शास्त्र और राजनीति में बहुत अंतर है. अपने पिता जी को मैंने कभी राजनेता के रूप में नहीं देखा. उन्हें हमेशा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखा. वो हमेशा सामाजिक गतिविधियों को ही राजनीति कहते थे. उन्होंने कभी राजनीति में भावनात्मक मुद्दों का सहारा नहीं लिया. आज मैं देखता हूं कि बहुत से राजनीतिक दल अपने फ़ायदे के लिए भावनात्मक मुद्दों को उ ाते हैं. मेरे लिए राजनीति समाजसेवा है. इसलिए जब कभी मैं अपने लोकसभा क्षेत्र में जाता हूँ तो एक राजनेता की तरह बात नहीं करता बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बात करता हूँ.

 अपने पिता जी को मैंने कभी राजनेता के रूप में नहीं देखा. उन्हें हमेशा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखा. वो हमेशा सामाजिक गतिविधियों को ही राजनीति कहते थे. उन्होंने कभी राजनीति में भावनात्मक मुद्दों का सहारा नहीं लिया. आज मैं देखता हूं कि बहुत से राजनीतिक दल अपने फ़ायदे के लिए भावनात्मक मुद्दों को उ ाते हैं.

 

इस तरह से कितने दिन चल पाएगा.

यही दृष्टिकोण लेकर मैं चला हूँ. और मुझे लगता है कि अगर ऐसे ही काम किया जाए तो देश की तरक्की होगी. अगर हम पहले की तरह जाति-धर्म के मुद्दे पर ध्यान देते रहेंगे तो बहुत दिक्कत होगी.

आप जैसे कई युवा, उच्च शिक्षा प्राप्त लोग राजनीति में आ रहे हैं. वो सभी ये बात कहते हैं कि राजनीति में भावनात्मक मुद्दे नहीं उ ाने चाहिए. लेकिन हमारे देश में कई तरह के लोग हैं उनकी अलग-अलग सोच है. उन्हें भावनात्मक रूप से साथ रखने की ज़रूरत है. तो इस तरह दूसरा तरीका अपनाकर कहीं युवा सांसद आम लोगों से कट तो नहीं जाएंगे.

हर राजनीतिक दल में ऐसे युवा सांसद हैं जो विकास की बात करते हैं. ये मिलकर काम करें तो बात बन सकती है. देखिए हमें विकास का काम भी करना है और अपने-अपने दलों में राजनीति भी करनी है. लोगों के बीच जाकर वोट भी लेने हैं. मुझे लगता है कि अगर हम लोगों के बीच जाएं और उनसे विकास की बात करें तो ऐसा नहीं है कि वोट नहीं मिलेगा. अपनी एक रणनीति और रवैया जनता के सामने रखेंगे कि देखिए मैं आपको नौकरी इस तरह से देना चाहता हूँ. आपके गांव का इस तरह से विकास करना चाहता हूँ. लोग बेवकूफ़ नहीं हैं. आपकी रणनीति कैसे लागू हो वो भी एक भावनात्मक मुद्दा हो सकता है.

आपने बोस्टन में पढ़ाई की है. बोस्टन और मुंबई में क्या अंतर देखने को मिला.

ंडी तो बहुत थी वहां. बर्फ़ गिरती थी वहां. मेरे लिए जो सबसे बड़ी बात थी वो ये थी कि मैं पहली बार घर छोड़कर जा रहा था और वो भी अमरीका. पैसे की कभी-कभी दिक्कत हो जाती थी. दुनियाभर की विविधता देखने को मिली. मेरे जो दोस्त बने वो अलग-अलग देशों के हैं. एक अमरीका का है, एक पोलैंड का है.

सब 'का' का ही हैं कोई 'की' नहीं है क्या.

इस विविधता के माहौल में रहना भी एक चुनौती था. वहां रहकर मुझे बहुत सीखने और जानने को मिला.

वहां रहने, जानने या बसने का मन नहीं किया.

हां था वैसे. मैं वहां साढ़े तीन साल पढ़ा. फिर एक साल शिकागो नौकरी में था. लेकिन वहां इतने दिनों के रहने के बाद लगा कि वापस लौटना चाहिए. एक भावनात्मक लगाव था. मुझे शुरू से पता था कि मैं वापस लौटूंगा. मैं 1995 में वहां गया था.

सबसे ज़्यादा क्या याद आता था. मां का बनाया खाना या पड़ोस की लड़की.

घर का खाना. वहां का खाना खाकर घर बहुत याद आता था.

घर की कुछ खाने वाली चीज़ पास नहीं होती थी.

मेरे पास तो नहीं होती थी. लेकिन मेरा एक दोस्त था अमित शाह. उसका घर अमरीका के न्यूजर्सी में ही था. उसके घर से खाने का सामान आता रहता था.

मुंबई में आप बड़े हुए हो. मुंबई की याद नहीं आती थी?

मुंबई का प्रदूषण, यातायात, मरीन ड्राइव, चौपाटी, मेरे वो सभी दोस्त जो मुंबई में थे. वैसे मैं साल में एक-दो बार छुट्टियों के लिए मुंबई आता था. मैं अपने घर का आराम बहुत मिस करता था. अमरीका में सारे काम ख़ुद करने पड़ते थे. जब मैं एक महीने के लिए घर आता था तो ख़ूब आराम से रहता था.

अब तो आपका काफ़ी समय दिल्ली में भी ग़ुजरता होगा. दिल्ली और मुंबई में क्या अंतर पाते हैं?

सांसद बनने के पहले दो वर्षों में मैं जब संसद सत्र में हिस्सा लेने सोमवार को दिल्ली आता था तो बुधवार को ही लौटने का मन करने लगता था. मेरे पिता जी को दिल्ली पहुंचते ही मुंबई वापस लौटन का मन करने लगता है. अब मेरा मन दिल्ली में लगने लगा है. आज मैंने दिल्ली में कई दोस्त बना लिए हैं. लेकिन मुबई मेरी पहली पसंद है. मुंबई और दिल्ली में जो मैंने अंतर देखा वो ये हैं कि दिल्ली में वर्ग-चेतना (क्लास कंशसनेस) बहुत है. मुंबई में आम आदमी को ये परवाह नहीं है कि आप क्या हैं. हर आदमी में ख़द को लेकर बहुत विश्वास है. उसको फ़र्क नहीं पड़ता कि आप फ़िल्म अभिनेता, राजनेता या बड़े व्यापारी हैं. मुंबई में आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करते.

मेरे ख़याल से मुंबई में आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करते हैं और दिल्ली में औहदे के आधार पर भेदभाव करते हैं.

 
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