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आडवानी की माँग को मनमोहन सरकार ने नकारा |
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परमाणु का जिन्न लगता है संसद के इस सत्र को ले डुबेगा , विपक्ष आडवानीजी के नेतत्व मे है सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति की भाजपा की माँग को जहाँ खारिज कर दिया, वही वाम दल सरकार की गले की फाँस बने है , संयुक्त संसदीय समिति में विपक्ष शामिल हुआ तो नयी मुसीबत सो मनमोहन ने नकारा
परमाणु मुद्दे पर चल रहा गतिरोध गुरुवार को संसद के बाहर आ गया। सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति की भाजपा की माँग को जहाँ खारिज कर दिया, वहीं विपक्ष ने अपनी माँग से पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया।
वामदलों ने भी सरकार पर अपना दबाव जारी रखा। भाकपा ने साफ कर दिया कि भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार के कुछ पहलुओं पर विचार के लिए ग ित समिति की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी।
विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली इस 15 सदस्यीय समिति की पहली बै क अगले हफ्ते यहाँ होने की संभावना है। भाजपा पर पलटवार करते हुए मुखर्जी ने कहा कि संप्रग सत्ता में उनके समर्थन से नहीं आई, बल्कि वामदलों के समर्थन से सत्ता में आई।
सरकार को बचाने के लिए समिति के ग न संबंधी विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी के बयान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर मेरा काम सरकार को बचाना है। यह मेरी अतिरिक्त जिम्मेदारी है कि अपने समर्थकों को साथ रखूँ, ताकि सरकार चलती रहे।
भावी रणनीति पर विचार करने के लिए राजग नेताओं की कल बै क होगी। भाजपा की वरिष् नेता सुषमा स्वराज ने संयुक्त संसदीय समिति ग ित कराकर दम लेने का दावा किया। उन्होंने कहा हम इसे करवाकर रहेंगे।
समिति के निष्कर्षों के बाध्यकारी नहीं होने संबंधी केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के बयान के बारे में पूछे जाने पर भाकपा नेता गुरूदास दासगुप्ता ने कहा कि अगर यह बाध्यकारी नहीं है तो यह किसलिए है। चाय पीने के लिए है? |