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पूर्व प्रधानमंत्री अटल अटल की खामोशी ने पस्त कर दिया |
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सांसदजी,अटलजी की ये ही अदा तो कातिल है पर 11 सितंबर को आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान को आतंकवाद की अपनी परिभाषा पढ़ाने आए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की लंबी खामोशी ने पस्त कर दिया था
वाजपेयी की खामोशी की कूटनीति का नतीजा यह निकला कि पश्चिमी देश भारत पर पाकिस्तान के साथ सुलह सफाई के लिए दबाव डाल कर जो कराना चाहते थे, वह नहीं हो सका और उसके बाद ब्लेयर ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर ही पूरा जोर लगा दिया, जिससे उन्हे कश्मीर के आतंकवाद को लेकर अपनी राय बदलनी पड़ी।
यह खुलासा ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के 12 वर्षो तक प्रेस सलाहकार रहे एलिस्टर कैम्पबैल ने अपनी नई पुस्तक में किया है।
कैम्पबैल ने भारत और पाकिस्तान से जुड़े अनेक संस्मरण कलमबद्ध किए हैं। इसी क्रम में उन्होंने 11 सितंबर 2001 के बाद की पर्दे के पीछे की महत्वपूर्ण घटनाओं का भी खुलासा किया है।
पुस्तक में कैम्पबैल कहते है कि एक बार जब यह तय हो गया कि अमेरिका तालिबान को सबक सिखाने के लिए अफगानिस्तान पर हमला करेगा तब अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश और ब्लेयर ने निर्णय लिया कि ब्लेयर पहले रूस जाकर राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन से मिल कर उन्हें विश्वास में लें और फिर पाकिस्तान जा कर जनरल मुशर्रफ की मुश्कें कसें। - कैम्पबैल की डायरियों में दर्ज संस्मरणों का प्रकाशन ब्लेयर के पद छोड़ने के बाद हुआ। किताब में वे लिखते हैं कि वे स्वयं इस्लामाबाद में ब्लेयर-मुशर्रफ की बै क में मौजूद थे। गर्मजोशी के साथ शुरु हुई इस अत्यंत गंभीर बै क में हंसी हाकों की गूँज सुनाई दे जाती थी।
जनरल मुशर्रफ से अपेक्षित सहयोग का आश्वासन मिलने के बाद ब्लेयर पाक को इनाम देने के बारे में बहुत संजीदगी से सोच रहे थे। उनके दिमाग में कश्मीर समस्या के समाधान की बात दौड़ रही थी। इसी विचार ने उन्हें उन दिनों कश्मीर को लेकर भारत और पाक के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने को प्रेरित किया।
कैम्पबैल लिखते है कि पहले सोचा गया कि का मांडू में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) की शिखर बै क में तनाव कम करने का एक मौका खोजा जाना चाहिए, लेकिन तनाव बहुत ज्यादा था। तब ब्लयेर पहले भारत पहुँचे जहाँ उनकी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से मुलाकात हुई। बातचीत में ब्लेयर ने बहुत कोशिश की लेकिन वाजपेयी टस से मस नहीं हुए। वे पाक नेताओं से बहुत कुछ अपेक्षा कर रहे थे।
वाजपेयी के बारे में कैम्पबैल ने लिखा कि वे बहुत खांटी नेता थे। उनका बिना झेंप वाली लंबी खामोशी अख्तियार कर लेना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई थी।
वे लिखते है कि भारत की यात्रा के बाद ब्लयेर का अगला पड़ाव इस्लामाबाद था जहाँ उनकी प्राथमिकता जनरल मुशर्रफ को आतंकवादी संग नों खासकर भारत में सक्रिय गुटों को लेकर कड़ा रुख अपनाने के लिए राजी करना था।
ब्लयेर चाहते थे कि जनरल मुशर्रफ तालिबान से पूरी तरह नाता तोड़े। उन्हें राजी करना आसान काम नहीं था एक बार तो वे ब्लेयर के यह कहने पर उखड़ पड़े थे कि पाकिस्तान और उसकी सरकार आतंकवाद का समर्थन करती है। |