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सांसदो ने आरक्षण मामले में कोर्ट की भूमिका पर सवाल उ ाये, कानून बना के मामला हल करने के पछ में |
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उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछडे़ वर्गो को आरक्षण देने पर अदालत द्वारा लगाई गई रोक पर लोकसभा में दोनों ही पक्षों के सदस्यों ने न्यायपालिका की भूमिका पर सवालिया निशान लगाया और सरकार से इसका तुरंत कोई रास्ता निकालने और जरूरत पड़े तो संसद का संयुक्त सत्र बुलाने की मांग की।
शून्यकाल में यह मामला उ ने पर द्रमुक के सी कुप्पुस्वामी और एल गणेशन ने कहा कि संसद ने सर्वसम्मति से यह कानून पारित किया है। सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला हो लेकिन संसद सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि अदालत के इस फैसले से छात्रों के शैक्षिक सत्र का नुकसान नहीं होने देने के लिए यदि जरूरी हो तो संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाना चाहिए। कुप्पुस्वामी ने यह मामला उ ाते हुये कहा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अदालत के फैसले से उत्पन्न स्थिति का कोई रास्ता निकालने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को पत्र लिखे हैं। उन्होंने कहा कि संसद को इस बारे में कोई रास्ता खोजकर अन्य पिछडे़ वर्गो की आकांक्षाओं को पूरा करना चाहिए। भाजपा के संतोष गंगवार ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसके लापरवाह व्यवहार और अदालत में ीक से पैरवी नहीं किए जाने के कारण हजारों छात्रों का एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे यह लगे कि हम इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं। चर्चा के बीच अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने उम्मीद जताई कि 8 मई को सुनवाई में इसका कोई हल निकल जाएगा और सदन की भावना का खयाल रखा जाएगा। चर्चा के दौरान उन्होंने कई बार सदस्यों को सचेत किया कि वे न्यायपालिका के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करें। उन्होंने कहा कि जिस तरह हम सम्मान के अधिकारी है न्यायपालिका भी इसकी हकदार है। राजद के देवेंद्र प्रसाद यादव ने इसे बहुत ही गंभीर बात बताई कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित एक कानून को लागू करने में बाधा डाली जा रही है। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत शासन के तीनों अंगों को अपनी हद में रहना चाहिए। मार्क्सवादी मौहम्मद सलीम ने कहा कि छात्रों के बर्बाद होने जा रहे शैक्षणिक सत्र को बचाने के लिए सरकार को जल्द ही कोई कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को अदालत में बहुत ही अच्छी तरह से अपना पक्ष रखना चाहिए। समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने कहा कि संसद की कोई सर्वसम्मत राय देश की जनता की सर्वसम्मत राय होती है इसलिए सरकार को चाहिए वह पूरी निष् ा और ईमानदारी से अदालत में इस मामले की पैरवी करे और हजारों छात्रों के शैक्षणिक भविष्य की रक्षा करे। कांग्रेस के किशोर चंद्र देव और थरुगका बालू ने कहा कि अभी सवाल यह है कि बच्चों का भविष्य खराब नहीं हो और न्यायपालिका तथा विधायिका में कोई विवाद नहीं हो। बालू का कहना था कि संसद के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। तेलुगु देसम के येरन नायडू ने भी कहा कि यदि जरूरत हो तो संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर कानून में बदलाव किया जाए। अकाली दल के सुखदेव सिंह ढींढसा ने अन्य दलों से कुछ अलग राय रखते हुए कहा कि संसद को प्रतिष् ा का सवाल बनाए बिना क्रीमी लेयर को अलग करने तथा गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों को भी आरक्षण देने के बारे में अदालत की राय को कानून में समाहित करना चाहिए। वह चाहते थे कि सदन को इस पर दोबारा विचार करना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टी के सीके चन्द्रप्पन, बीजू जनता दल के बृजेश किशोर त्रिपा ी, पीएमके केई पुन्नु स्वामी और केरल कांग्रेस के पीसी थामस ने भी सरकार से इस बारे में प्रभावी कदम उ ाने की मांग की।
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